मन की व्यथा मैं किससे , हर पल के जा सुनाऊ
क्या उम्र भर मैं यों ही इस दिल को यूँ तडपाउ
भटका हुआ मुशाफिर था फिर क्यों डगर पे लायी
बनना ना हमसफर था,फिर क्यों तू दिल लगायी
जिंदगी के हर रात के सपनों में तुम तो आती हो
पास आकर मुस्कराकर फिर दूर चली जाती हो
तेरा मिलाना, तेरा मुस्कराना मुझे आज भी यद् आती है
तेर तन का सुगंध सांसों का गंध एहसास बन तडपती है
दुनिया के हर झंजावत को मैं तो झेल जाऊंगा
हो तेरा इशारा तो ,सागर के पार भी आऊंगा
मैं तो सब्र कर लेता हूँ प़र इस नादान दिल को समझायुं कैसे
पैरों में मेरे बंधन है तड़पते इस दिल को बताऊँ कैसे
कितनी हशरत से देखा था तुने मुझे,उस लम्हों को दिल से भुलाऊँ कैसे
निगाहे तोतुमसे यूँ मिलती ही है प़र आवाज देकर बुलाऊँ कैसे