Wednesday, 19 September 2012

भलाई का संदेश


स्वामी विवेकानंद अमेरिका जानेवाले थे ।अमेरिका जाने से पूर्व माँ शारदा का आशीर्वाद लेने गए और कहा ,"माँ मैं अमेरिका जा रहा हूँ ।मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए ।"
यह सुनकर भी माँ पर तो जैसे कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा । स्वामी जी ने माँ से फिर आशीर्वाद माँगा ,माँ  फिर चुप्पी साधे रही ।काफी देर बाद माँ ने स्वामी जी से कमरे की तक में पड़ा चाकू ले आने को कहा । उन्होंने झट से चाकू लाकर दे दिया ।पर आशीर्वाद से चाकू का क्या रिश्ता है , यह वे समझ न सके ।
इधर माँ ने चाकू पाते ही आशीर्वाद की झड़ी लगा दी ।स्वामी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे माँ से चाकू एवं आशीर्वाद का सम्बन्ध पूछ ही बैठे ।
माँ ने मुसकराते हुए जबाब दिया ,:पुत्र जब मैंने चाकू माँगा तो तुम चाकू का फल तो अपने हाथ में पकडे रहे और दूसरी ओर से चाकू मुझे थमा दिया ।इससे मै समझ गई कि तुम सारी बुराईओ को अपने पास रखकर लोगो की भलाई करोगे । स्वयं चाहे तुम विष पी लो , परन्तु लोगो में अमृत ही बाटोगे ।मै  तुम्हे हृदय से आशीर्वाद दे रही हूँ ।
यह सुनकर स्वामीजी बड़े निश्छल भाव से कहने लगे . "पर माँ मैने तो यह सोचा भी नहीं था ।मै चाकू का फल इस कारण पकडे रहा  तुम्हे चोट न लगे ।
पर माँ प्रसन्न होकर कहने लगी की तब तो और भी अच्छा है ।तुम्हारा तो स्वाभाव में ही भलाई है , तुम किसी का बुरा नहीं करोगे ।तुम जन्म से ही महान हो , सहज संत हो ।

Thursday, 6 September 2012

स्वामी विवेकानंद और भंगी

सन 1888   की  घटना है । स्वामी जी लखनऊ से  वृन्दावन जा रहे थे ।वृन्दावन जाने के रास्ते  में ही उन्होंने देखा कि सड़क के किनारे एक आदमी  निश्चिन्त होकर तम्बाकू पी रहा था ।स्वामीजी कुछ पल के लिए रुके और हाथ बढ़ा कर उस आदमी से चिलम मांगी ।उस आदमी ने देखा कि एक युवा सन्यासी ,जिसके मस्तक से तेज चमक रहा है,उससे  चिलम मांग रहा है तो संकोच और भय  के मिले जुले भाव उसके ह्रदय में उत्पन्न हुए ।उसने कहा , " महाराज "मैं जाती  से भंगी हूँ ।"
भंगी यानि मेहतर ।स्वामीजी ने यह सुना तो उनका हाथ स्वतः पीछे हट गया ।वे मार्ग पर आगे बढने लगे ।किन्तु कुछ दूर जाने पर मानो उनकी चेतना लौटी ।उन्होंने सोचा ,"ओह ,धिक्कार है मुझे ।अब तक मैंने आत्मा के एकत्व पर ध्यान दिया है ।मैंने तो कुल,जाती , मान -सभी को त्यागकर सन्यास ले लिया है।फिर उसकी जाति (मेहतर )जानने के बाद मेरा जाति -अभिमान भला क्यों जाग गया ।उसे अछूत मानकर उसकी चीज छुए बिना मै आगे क्यों बढ़ गया ?उसकी छुई हुयी चिलम मैंने क्यों नहीं ली ? क्या अपने पूर्व  संस्कारो पर विजय प्राप्त करना सचमुच कठिन है ?    
स्वामीजी वापस उस भंगी के समीप पहुंचे ।उन्होंने उससे चिलम भरवाई और उसके साथ ही बैठकर उसका आनंद लिया ।तत्पश्चात  ही वे आगे बढ़े । तब उनके चित को असीम सुख प्राप्त हुआ ।

Saturday, 1 September 2012

मूर्ति और आस्था

एक बार अलवर के महाराजा ने  स्वामी विवेकानंद से पूछा "स्वामी जी !लकड़ी ,मिट्टी ,धातु या पत्थर की बनी मूर्तियों के प्रति भक्ति भाव नहीं रखता ।क्या इसके लिए मुझे परलोक में कठोर सजा भुगतनी पड़ेगी ?"
स्वामी जी बोले ,"अपने विश्वास के अनुसार उपासना करने पर परलोक में सजा  क्यों मिलेगी ?"
उनकी यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित लोग सोचने लगे कि श्री बिहारीजी के मंदिर में श्री मूर्ति के सम्मुख भजन गाते समय भावावेश में रोते हुए साष्टांग गिरने वाले स्वामीजी ने मूर्ति पूजा के समर्थन में तर्क क्यों नहीं दिया ? उसी समय स्वामीजी की दृष्टि महाराज के एक चित्र (जो दिवार पर टंगा था ) पर पड़ी ।स्वामी जी ने उसे उतरवाया और महाराज के सामने ही दीवान तथा अन्य राजकर्मचारियों से कहा , "इस चित्र पर थूकिये ।'
काफी देर तक उनके कहने पर भी किसी ने नहीं थूका ।दीवान ने कहा ," आप क्या कह रहे है ,स्वामी जी !क्या हम महाराज के चित्र पर थूक सकते है !"
स्वामी जी ने पूछा , "क्यों नहीं थूक सकते? इसमे महाराज स्वयं तो उपस्थित नहीं है ।यह तो सिर्फ कागज है ।यह महाराज की तरह हिल डुल भी नहीं सकता ।आप लोग इसपर इसलिए नहीं थूक रहे है कि थूकने से महाराजा के प्रति असम्मान प्रकट होगा ।क्यों यह बात सही है न ?"
सभी समवेत स्वर में कहा , " जी हाँ "
स्वामी जी ने कहा , "महाराज इस चित्र में आप नहीं है ;किन्तु दूसरी दृष्टी से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि इस चित्र में भी आपका अस्तित्वा अस्तित्व है ।इसलिए कोई इसपर थूकने के लिए तैयार नहीं हुआ ।ये लोग आपको तथा इस चित्र को एक  ही दृष्टी से देखते है ।इसी तरह भक्तगण द्वारा मूर्तियों एवं चित्रों में भगवन को देखते ही मन-मस्तिष्क में उसी भगवन की छवि अंकित हो जाती है ।मैंने अनेक स्थानों पर भ्रमण किया, परन्तु कही भी किसी हिन्दू को यह कहते कभी नहीं सुना है कि  हे चित्र , हे पत्थर ,हे धातु !मै तुम्हारी पूजा कर रहा हूँ ।तुम मुझ पर प्रसन्न हो जाओ ।भक्तगण तो अपने ह्रदय में भगवन की छवि बैठाये रखते है और अपने अपने भाव से ,विभिन्न प्रकार से उनकी उपासना  है।"
स्वानी जी का यह उत्तर सुनकर महाराज सहित वहां उपस्थित सभी लोग गद्गद हो गए ।