Saturday, 1 September 2012

मूर्ति और आस्था

एक बार अलवर के महाराजा ने  स्वामी विवेकानंद से पूछा "स्वामी जी !लकड़ी ,मिट्टी ,धातु या पत्थर की बनी मूर्तियों के प्रति भक्ति भाव नहीं रखता ।क्या इसके लिए मुझे परलोक में कठोर सजा भुगतनी पड़ेगी ?"
स्वामी जी बोले ,"अपने विश्वास के अनुसार उपासना करने पर परलोक में सजा  क्यों मिलेगी ?"
उनकी यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित लोग सोचने लगे कि श्री बिहारीजी के मंदिर में श्री मूर्ति के सम्मुख भजन गाते समय भावावेश में रोते हुए साष्टांग गिरने वाले स्वामीजी ने मूर्ति पूजा के समर्थन में तर्क क्यों नहीं दिया ? उसी समय स्वामीजी की दृष्टि महाराज के एक चित्र (जो दिवार पर टंगा था ) पर पड़ी ।स्वामी जी ने उसे उतरवाया और महाराज के सामने ही दीवान तथा अन्य राजकर्मचारियों से कहा , "इस चित्र पर थूकिये ।'
काफी देर तक उनके कहने पर भी किसी ने नहीं थूका ।दीवान ने कहा ," आप क्या कह रहे है ,स्वामी जी !क्या हम महाराज के चित्र पर थूक सकते है !"
स्वामी जी ने पूछा , "क्यों नहीं थूक सकते? इसमे महाराज स्वयं तो उपस्थित नहीं है ।यह तो सिर्फ कागज है ।यह महाराज की तरह हिल डुल भी नहीं सकता ।आप लोग इसपर इसलिए नहीं थूक रहे है कि थूकने से महाराजा के प्रति असम्मान प्रकट होगा ।क्यों यह बात सही है न ?"
सभी समवेत स्वर में कहा , " जी हाँ "
स्वामी जी ने कहा , "महाराज इस चित्र में आप नहीं है ;किन्तु दूसरी दृष्टी से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि इस चित्र में भी आपका अस्तित्वा अस्तित्व है ।इसलिए कोई इसपर थूकने के लिए तैयार नहीं हुआ ।ये लोग आपको तथा इस चित्र को एक  ही दृष्टी से देखते है ।इसी तरह भक्तगण द्वारा मूर्तियों एवं चित्रों में भगवन को देखते ही मन-मस्तिष्क में उसी भगवन की छवि अंकित हो जाती है ।मैंने अनेक स्थानों पर भ्रमण किया, परन्तु कही भी किसी हिन्दू को यह कहते कभी नहीं सुना है कि  हे चित्र , हे पत्थर ,हे धातु !मै तुम्हारी पूजा कर रहा हूँ ।तुम मुझ पर प्रसन्न हो जाओ ।भक्तगण तो अपने ह्रदय में भगवन की छवि बैठाये रखते है और अपने अपने भाव से ,विभिन्न प्रकार से उनकी उपासना  है।"
स्वानी जी का यह उत्तर सुनकर महाराज सहित वहां उपस्थित सभी लोग गद्गद हो गए ।

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