Thursday, 6 September 2012

स्वामी विवेकानंद और भंगी

सन 1888   की  घटना है । स्वामी जी लखनऊ से  वृन्दावन जा रहे थे ।वृन्दावन जाने के रास्ते  में ही उन्होंने देखा कि सड़क के किनारे एक आदमी  निश्चिन्त होकर तम्बाकू पी रहा था ।स्वामीजी कुछ पल के लिए रुके और हाथ बढ़ा कर उस आदमी से चिलम मांगी ।उस आदमी ने देखा कि एक युवा सन्यासी ,जिसके मस्तक से तेज चमक रहा है,उससे  चिलम मांग रहा है तो संकोच और भय  के मिले जुले भाव उसके ह्रदय में उत्पन्न हुए ।उसने कहा , " महाराज "मैं जाती  से भंगी हूँ ।"
भंगी यानि मेहतर ।स्वामीजी ने यह सुना तो उनका हाथ स्वतः पीछे हट गया ।वे मार्ग पर आगे बढने लगे ।किन्तु कुछ दूर जाने पर मानो उनकी चेतना लौटी ।उन्होंने सोचा ,"ओह ,धिक्कार है मुझे ।अब तक मैंने आत्मा के एकत्व पर ध्यान दिया है ।मैंने तो कुल,जाती , मान -सभी को त्यागकर सन्यास ले लिया है।फिर उसकी जाति (मेहतर )जानने के बाद मेरा जाति -अभिमान भला क्यों जाग गया ।उसे अछूत मानकर उसकी चीज छुए बिना मै आगे क्यों बढ़ गया ?उसकी छुई हुयी चिलम मैंने क्यों नहीं ली ? क्या अपने पूर्व  संस्कारो पर विजय प्राप्त करना सचमुच कठिन है ?    
स्वामीजी वापस उस भंगी के समीप पहुंचे ।उन्होंने उससे चिलम भरवाई और उसके साथ ही बैठकर उसका आनंद लिया ।तत्पश्चात  ही वे आगे बढ़े । तब उनके चित को असीम सुख प्राप्त हुआ ।

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