स्वामी विवेकानंद अमेरिका जानेवाले थे ।अमेरिका जाने से पूर्व माँ शारदा का आशीर्वाद लेने गए और कहा ,"माँ मैं अमेरिका जा रहा हूँ ।मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए ।"
यह सुनकर भी माँ पर तो जैसे कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा । स्वामी जी ने माँ से फिर आशीर्वाद माँगा ,माँ फिर चुप्पी साधे रही ।काफी देर बाद माँ ने स्वामी जी से कमरे की तक में पड़ा चाकू ले आने को कहा । उन्होंने झट से चाकू लाकर दे दिया ।पर आशीर्वाद से चाकू का क्या रिश्ता है , यह वे समझ न सके ।
इधर माँ ने चाकू पाते ही आशीर्वाद की झड़ी लगा दी ।स्वामी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे माँ से चाकू एवं आशीर्वाद का सम्बन्ध पूछ ही बैठे ।
माँ ने मुसकराते हुए जबाब दिया ,:पुत्र जब मैंने चाकू माँगा तो तुम चाकू का फल तो अपने हाथ में पकडे रहे और दूसरी ओर से चाकू मुझे थमा दिया ।इससे मै समझ गई कि तुम सारी बुराईओ को अपने पास रखकर लोगो की भलाई करोगे । स्वयं चाहे तुम विष पी लो , परन्तु लोगो में अमृत ही बाटोगे ।मै तुम्हे हृदय से आशीर्वाद दे रही हूँ ।
यह सुनकर स्वामीजी बड़े निश्छल भाव से कहने लगे . "पर माँ मैने तो यह सोचा भी नहीं था ।मै चाकू का फल इस कारण पकडे रहा तुम्हे चोट न लगे ।
पर माँ प्रसन्न होकर कहने लगी की तब तो और भी अच्छा है ।तुम्हारा तो स्वाभाव में ही भलाई है , तुम किसी का बुरा नहीं करोगे ।तुम जन्म से ही महान हो , सहज संत हो ।